स्पेस : श्रेष्ठता के लिए आंदोलन

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यह मुक्ताकाश है। एक नैसर्गिक आंदोलन है। अपने ही भीतर श्रेष्ठता की तलाश का अनंत अनवरत् सिलसिला है। अभाव, दबाव और प्रभाव से सत्ताओं, व्यवस्थाओं, समाजों और सभ्यताओं को बदलने के दिन अब लद रहे हैं। बाह्य क्रांतियों और आंदोलनों का दौर अब चुक रहा है। अब भीतर के बदलाव की बारी है। अपने ही भीतर से बेहतरी को, श्रेष्ठता को छूने, पाने और जीने की तैयारी है। नये दौर में, नई सदी में यह आंदोलन की नूतन लय है। यह श्रेष्ठता का जन-आह्वान है। बेहतरी के लिए बदलाव का जन-आंदोलन है। यहां प्रतियोगिता, प्रतिस्पर्धा, ईष्या, कटुता और कलह से परे पारस्परिक पूरकता को जानने, समझने और जीने का स्वाभाविक उमंग है, तरंग है।

‘प्रत्येक व्यक्ति श्रेष्ठ है’ के मौलिक अधिष्ठान से उद्गमित होता यह जनक्रांतिकारी प्रक्रम संस्था, संगठन, दल, पक्ष और विचारधारा के किसी दायरे और सीमाबंधन से मुक्त है। व्यक्ति-व्यक्ति में अन्तर्निहित श्रेष्ठता का आह्वान बनता यह आंदोलन क्षुद्र से विराट में लय होने की अमूर्त सैद्धांतिकता का प्रकट प्रयोग है। यहां भाषण, मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और प्रबोधन के पार सहज संवाद और पारस्परिक अभिव्यक्ति को बदलाव के माध्यम के रूप में अपनाया जा रहा है।

यह बाहरी दुनिया के लोभ और भय से उत्पन्न तनाव और विक्षोभ को अपने अंदर की दुनियां की सहज रचनात्मकता की खोज से संतुष्ट करने की स्वाभाविक कला का प्रवाह है। ‘स्पेस’ केन्द्रीय और संख्यात्मक प्रभाव से प्रेरित गतिविधियों से इतर विविधायामी, गुणात्मक, चर्चा-संवादपरक गतिविधियों के माध्यम से व्यक्ति और समूह की श्रेष्ठता का निरंतर आह्वान करता है।

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